Wednesday, April 1, 2015

नारी सशक्तिकरण के असली मायने ..

‪#‎दीपिकापादुकोण‬ द्वारा अपनी आवाज देते हुए नारी स्वातंत्र्य को प्रेरित करने हेतु बनाये गए वीडियो को कई बार देखने और सुनने के बाद अभिव्यक्ति की व्यग्रता ने बिना कुछ कहे आगे बढ़ने नहीं दिया, अतः आप सब से एक प्रश्न करने का मन कर रहा है की क्या ‪#‎mybody‬‪#‎mymind‬ , ‪#‎mychoice‬ का नारा सामाजिक जीवन में औचित्यपूर्ण है ? जहाँ हम सब सहअस्तित्व से निर्मित सामाजिक ताने बाने में जीवनरत हैं ।मैं यह मानता हूँ की दीर्घकालिक विसंगतियों और इड़ा प्रधान पुरुषवादी सोच ने लैंगिक अन्याय किये हैं और यह जगजाहिर है की यह अन्याय हमारी जन्मदात्री स्त्री वर्ग के साथ ही हुए हैं किन्तु इस की प्रतिक्रिया स्वरुप नारी विमर्श और स्वातंत्र्य को मात्र दैहिक एवं भौतिक स्वातंत्र्य तक सीमित करना तार्किक है और वो भी सहअस्तित्व के सिद्धान्त के खिलाफत की हद तक जाकर ।...।।

यदि इस वीडियो में कही बात को सामजिक स्वीकृति मिल भी जाए तो क्या समाज सही मायने में शेष भी रहेगा , मुझे संदेह है ! एक ओर मैं फिर कह रहा हूँ की पुरुष वर्ग द्वारा आज भी महिलाओं को समकक्ष मानने के उदहारण अपवाद मात्र ही मिलेंगे जो की निहायत ग़लत और पूर्वाग्रह पूर्ण है किन्तु दूसरी ओर यदि महिलाओं द्वारा पारिवारिक बंधनों को लांघना और अपने विपरीतलिंगी से उसी बंधन में बंधे रहने की अपेक्षा करते रहना , स्वयं लंबे संबंधो के बाद भी शादी से इनकार करने को अपने विकल्प के रूप में देखना और वहीं अपने पुरुषमित्र के ऐसे ही किसी व्यवहार को बलात्कार जैसे जघन्य और पाश्विक अपराध के रूप में प्रस्तुत करना ही नारी सशक्तिकरण के असली मायने हैं तो मैं भयभीत हूँ । सहअस्तित्व में स्वातंत्र्य से कहीं ज्यादा आवश्यक सामंजस्य होता है , ऐसा मेरा मनना है ।

लेकिन अभी प्रायश्चित करने और अपने द्वारा (पुरुष वर्ग) किये गए और किये जा रहे स्तरहीन व्यवहार के लिए क्षमा मांगने का दायित्व दूसरे पक्ष की आलोचना करने से ज्यादा समीचीन है ।। क्षमा अगर अभिव्यक्ति में भटकाव आया हो //बाई द वे इट्स माय च्वॉइस //
................................शिवम् मिश्र

Tuesday, February 24, 2015

दिल से....

तुम्हारे दिल की धड़कन को ,
अगर हम सुन नहीं पाये।
समझ लेना, हमारी शक़्ल में ,
फिर हम नहीं आये।।
*******************
तुम्हारे दर्द - ए - उल्फ़त से ,
नज़र जो नम न हो पायीं।
वो आँखे गैर की होंगी ,
ये आँसू कम  नहीं आये।।
*******************
मेरा अल्लाह तेरी रूह ,
मेरा सजदा तेरी चाहत।
मेरी हर नज़्म भी है तू ,
तेरी यादें मेरी दावत।।
*******************
मेरी हर जुफ्तज़ू में ,
तेरी इनायत की तलबग़ारी।
ग़मज़दा हूँ,  पर ख्वाहिश है ,
तुझे ग़म छू भी न पाये।।
********************
अकेले इस जहाँ से ,
इश्क़ में तेरे, जो लड़ पाये।
शिक़ायत और शिकवों से ,
कभी आगे न बढ़ पाये।।
********************
झुका वज़ूद,   हर सिम्त ,
तेरी बेवफ़ाईओं से है।
ज़माना जानता है ,
हम यहाँ बेदम नहीं आये।।
************************ जारी ।। ....


Sunday, November 17, 2013

तो हम कैसे प्यार करे !!!

आँख के आंसू बह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।
ग़म के तूफां सह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।।
इश्क़ नहीं है इतना आसां,
की जब चाहा इश्क़ किया।
दिल की अपने कह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करे।।

उनकी पाक़ रूहानी शीरत,
सहज सरल सौंदर्य की मूरत।
तम को दूर करें जो किरणें,
उन किरणों सी उनकी सूरत।। 
उनकी भला बखान करूँ क्या ,
मन निर्मल जैसे गंगा जल।
बातें उनकी भगवत गीता,
कहने की कुछ नहीं जरुरत।।

उनके संग गर रह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।
गैर को अपना कह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।।
पर पीड़ा महसूस करे जो,
वो ही सच्चा स्नेही है।
भावों में उनके बह न सके जब,
तो हम कैसे प्यार करें।।

                                      … जारी .......... 

Wednesday, November 6, 2013

कहूं कैसे (भाग दो)

मधुर संगीत के पीछे , वो सुन्दर साज होता है !
मुहब्बत में कहाँ कब क्यूँ , कोई भी राज होता है !!
कहूं कैसे क्यूँ रूठे हो , नहीं मानोगे क्या अब तुम !
समर्पित हो जहाँ सब कुछ , वहाँ भला कब नाज होता है !!

दीवाना क्यूँ वो कहता है , वो पागल क्यूँ समझता है !
मोहब्बत कि नुमाइश क्यूँ , वो सरेआम करता है !!
वो मुझसे दूर कैसी है , मैं उससे दूर कैसा हूँ !
दिलों की आपसी बातें , क्यूँ वो नीलाम करता है !!

किसी को क्या फ़रक पड़ता , अगर हम जी नहीं पाते !
ज़माने की  जकारत का जहर , हम पी नहीं पाते !!
कहूं कैसे जमाने को , ज़माना क्यूँ न ये समझे !
दिलों की  दूरियों का ज़ख्म , कभी हम सी नहीं पाते !!
                                                         …………………जारी………।





Monday, October 28, 2013

कहूं कैसे........(भाग एक)



ग़मों की स्याह चादर में,  बदन लिपटा ही रहता है।
ख़ुशी की पाक़ चाहत में,  मन चिपटा ही रहता है।।
कहूं कैसे ये खुल के मैँ,  कि फ़ितरत क्या है इन्सां की।
ज़माने की जकड़ में ये,  सदा सिमटा ही रहता है।।

न तेरी है न मेरी है, कहानी सब की बस ये है।
कभी अपने, कभी सबके, सुखों की कशमकश ये है।।
कहूं कैसे हसीं जीवन, उन्हीं के साथ है मेरा।
सभी का साथ मिल जाए, तमन्ना जस की तस ये है।।

अपने जब से यूँ बिछड़े हैं, कि तिल-तिल रोज मरता हूँ।
व्यथित हूँ इस कदर, ख़ुद को ही अपनाने से डरता हूँ।।
कहूं कैसे द्रवित है दिल , दमित है मन क्यूँ ये मेरा।
सभी से ख़ुद को क्यूँ माँगा , शिक़ायत ख़ुद से करता हूँ।।

                                           ……… जारी ....... 

Saturday, November 10, 2012

मन का संशय ...


हालिया अनुभवों स्व अनुदित कविता की कुछ पंक्तियाँ .....

संदेह सहित है सब जग में ,
संशय भय मेरे रग रग में !
मन दुःख से तब भर जाता है ,
अपनों के कांटे जब हों डग में !!

जब सब ही हों सच्चे मन के ,
मन भी सैम सुंदर हो तन के !
जब झूठ फ़रेब से बचा रहूँ ,
क्यूँ फिरूं ब्यथित पागल बन के !!

अब मन में संशय है इतना ,
खुद पर ही श़क मैं करता हूँ !
सांसें भी रोके रखता हूँ ,
जब कभी कभी मैं सोता हूँ !!

........................शिवम् (मुसाफ़िर) 

Friday, October 26, 2012


मेरी नवीन अनुभूतियों से उपजे मेरे गीत की कुछ पंक्तियाँ....

..जब मैं इस दुनियां से,
 चला जाऊँगा..
सच कहता हूँ,
मैं याद बहुत आऊंगा !!

जाने वालों को भला,
किसने है रोका अबतक..
मौत की आस में,
खाया है धोखा अबतक !!

कौन जाने कि मेरी,
आखिरी कशिश क्या है..
नहीं मालूम मुझको,
मेरी परवरिश क्या है !!

लोग कहते हैं,
तू तो सभी का प्यारा है..
हकीकत ये है, बस
मौत ही अब सहारा है !!

Tuesday, December 20, 2011

हक़ीकत है नहीं, कुछ भी...

जीवित होना मात्र,

लक्ष्य नहीं मेरा...
कुछ भले जज़बात,
भी तो चाहिए...

हजारों बंदिशों में,
जी रहा हूँ मैं अभी...
मर जाने के हालात,
यूँ न लाईये...

ज़माना है,
मेरा दुश्मन...
कि दुश्मन मैं,
जमाने का...

कोई बतला दे,
मुझको अंत...
इस अनचाहे,
फ़साने का...

कोशिश है मेरी,
अपना लें...
मुझको सब,
मेरे अपने...

हक़ीकत है नहीं,
कुछ भी...
पराये हो गए,
.......सपने !!!

Tuesday, November 1, 2011

मन की कालिख.....


आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!


आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!


सुबह-शाम  प्रभु नाम की माला,
मस्तक तिलक लगाना यूँ....
मात-पिता की सुध बिसरा के,
उनको यूँ ठुकराना क्यूँ ??

खुद की खातिर खूब जतन की,
खरा खजाना भर बैठे !
मंदिर-मस्जिद प्रतिदिन पहुंचे,
क्यूँ ना अपने घर बैठे ??

आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!

जनम-मरण के जाल में फंसकर,
जब तू जग में आता है !
सच-सच बोल! अरे ये प्राणी,
क्या कुछ "कर" में लाता है ??

निडर हो कहते, निर्भय रहते,
मौत से फिर क्यूँ डर बैठे ?
स्नेह को भूले, दंभ में फूले,
जीते जी क्यूँ मर बैठे ??


आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!

आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!