Tuesday, November 24, 2009

जीना सिखा दिया



जीवन को एक पल में, जीने की चाह ने
जीना सिखा दिया !


जीता हूँ इसलिए की, मरना है एक दिन,
जिन्दादिली के इसी, ज़ज्बात ने मौत से,
लड़ना सिखा दिया !


सोचता हूँ की इस,बेदर्द ज़माने से चला जाऊं,
पर इस ज़माने ने,अनजाने में ही मुझे दर्द को,
सहना सिखा दिया!


देखता हूँ जब उनकी, आँखों में आंसुओं की धार,
उनके दुखों के बादल ने, मेरे आंसुओं को भी,
बहना सिखा दिया!


क्यों चला जाऊं , कहीं और उनके बगैर मैं ,
उन तन्हाईयों में ,जिसने साथ साथ मिलकर,
चलना सिखा दिया!


जियो जी भरकर, एक एक पलों को,
खोल दो सारे बंधन, चहकने दो जीवन को,
इसी अंदाज ने तो मुझको,
हँसना सिखा दिया!

जीवन को एक पल, में जीने की चाह ने,
जीना सिखा दिया!

1 comment:

परमजीत बाली said...

सुन्दर रचना है।बधाई!!