Saturday, February 20, 2010

विमर्श...

 समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल ब्याध !
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध !!

          अपने प्रिय कवि रामधारी सिंह "दिनकर"  की इन्हीं पंक्तियों से प्रेरणा लेते हुए मैंने तटस्थता का चोला अब उतर फेंका है,  और अपनी किसी सक्रिय भूमिका की तलाश में रत हूँ ! सच है आज हममें  संवेदन शीलता की खाशी कमी होती जा रही है, और हम अपने निहित निजी स्वार्थों से परे कुछ भी देखने या सुनने की स्थिति में नहीं हैं !

          पर आखिर कब तक हम  यूँ  ही अपने आप को छलावा देते रहेंगे, और गांधीजी के बंदरों की श्रेणी में रहकर गौरवान्वित  महसूस करेंगे ?  बुरा करना निश्चित ही ग़लत है, किन्तु बुरा देखने और सुनने से खुद को रोकना ...एक प्रकार से बुरा होने देना ही है, जो अपने आप में एक अपराध है ! हाल  ही में मैंने गाँधी जी के बंदरों की द्विताय  एवं तृतीय श्रेणी से बाहर  निकलकर  कुछ नौनिहालों के नादान बचपन को बालश्रम रूपी दैत्य से मुक्त कराया ,, सच मानो बहुत सुकून मिला !

        स्वयं की प्रेरणा  से ही कुछ कह सकने का साहस जुटा पाया हूँ ! निश्चित ही संवेदना में  स्वयं वेदना का मर्म नहीं हो सकता, लेकिन इसका अर्थ  यह कदापि नहीं है की हम निरंतर संवेदन हीनता की ओर उन्मुख होते रहें ! और स्वयं के कष्ट में न होने को संपूर्ण समाज के कष्टविहीन होने का पैमाना मान लें !क्या यह गर्दभ स्वभाव हम मनुष्यों के लिए  उचित है ?...शायद नहीं !जब हम अन्याय के शिकार होतें हैं तो हर वो शख्श जो उस समय उस अन्याय को अपनी तटस्थ स्वीकृति देता है, हमें  अन्यायी ही लगता है ! तो फिर यही पैमाना उस वक़्त भी लागू होता है जब हम स्वयं भी रोजाना ऐसा ही करते हैं !

            आज हम सभी कहते हैं की हमारा देश महान है, और हमें ऐसा कहना भी चाहिए किन्तु ज़रा सोचिये इतनी गरीबी ,असमानता, भुखमरी, अशिक्षा, घरेलु हिंसा,भाषावाद, प्रांतवाद के नाम पर हिंसा आदि के होते देश की महानता का दंभ भरना अशोभनीय नहीं लगता ? मुझे तो बस नागार्जुन की कही बात याद आ गयी ......
           
जहाँ न भरता पेट ,
 देश वो जैसा भी हो...महानरक है !!! " 

Thursday, February 18, 2010

मॉडर्न ज़माना

मॉडर्न ज़माना देखो जी,
कही है रूखी कही है घी !!

माँ को मॉम पिता को डेड,
बाल रंगाये डिफ़रेंट शेड !
हिंदी को चाकू मारे, अंग्रेजी को गोली,
जाने कैसी भाषा इनकी, जाने कैसी बोली !

मॉडर्न ज़माना देखो जी,
पीते हैं सिगरेट संग टी !!

दिन में सोयें रात को जागें,
 डालर   पीछे घर को त्यागें !
ट्वीटर फेसबुक ओर्कूट ब्लॉगिंग,
फास्ट फ़ूड खाते करते जॉगिंग !

मॉडर्न ज़माना देखो जी,
फेर है ये समझ समझ की !!

ये तो था अधूरा सत्य,
पता इन्हें अपने कर्त्तव्य !
स्फूर्ति भरा है इनका मन,
मेहनत से नित करें  सृजन !

मॉडर्न ज़माना देखो जी,
इनका धर्म मानवता ही !!

चतुर्दिक प्रगति है  इनका लक्ष्य,
जो है करनी वही है कथ्य !
तर्क आधारित सोच विचार,
तीव्र बुद्धि विनम्र ब्यवहार !

मॉडर्न ज़माना देखो जी,
पथिक मैं  भी अनजाना ही !!

Tuesday, February 16, 2010

कोशिश!!

आज मैंने देखा उसे,
जो चीख चीख कर पुकार रही थी !

बह रहे थे अश्रु उसकी आँखों से,
 वो निहार रही थी !

आँखे फेरे मैं  भी,
 बढ़ चला था औरों कि तरह, पर
वो निरीह सी, मृतप्राय, 
रुन्धें  स्वर से कराह रही थी !

याद आया कि जाना है
मंजिल कि ओर मुझे, फिर भी 
जा न पाया एक कदम,  और 
 ठिठक सा गया, सोचता रहा !!!!

जिसने मुझे बचपन का एहसास दिया,
 जिसकी गोद में मैं खेला ,
जिसने खुद को भुला दिया मुझे तराशने में
क्या यही है उसकी परिणति ????

सहसा , मैं सिहर उठा , काँप सा गया 
लगा , मानो मेरी आत्मा मुझे दुत्कार रही है
क्या आज मैं इतना डूब चूका था,
 आत्मसंतुष्टिकरण में! कि,
 न देख पाया अपनी संसृति को ,
अपने अस्तित्व के सूत्रधार को !

मैं तो ठहर गया समर्पित होने को
पर .....क्या मैं, "हम" नहीं हो सकता ?

वो कोई और तो नहीं.....
हमारी  धरती , हमारी माँ है ,
ठहरो!!! भर दो उसके सूनेपन को, जिसने हमें रचा है
पोछ लो!!! उसके एक एक आंसुओं  को,
 जीवित कर दो!!!  उसे

क्यूंकि, वो है तो सब है, वो नहीं, तो सिर्फ सूनापन...........

Monday, February 15, 2010

यथार्थ!!!

छीनता हो स्वत्व कोई, और तुम , त्याग तप से काम  लो यह पाप है ,
पुण्य है, विछिन्न कर देना उसे , बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है!!!!

          दिनकर की इन्ही पंक्तियों से सीख  लेने  की आवश्यकता है  हमारी सरकार को ! ऐसा कैसे हो सकता है कि हम ऐसे  देश  से हाथ मिलाना चाहे जिसके हाथ हमारे देशवासियों के खून से रंगे हुए हो ! आज समझना होगा कि आखिर क्या है हमारी प्राथमिकता ?  एक फिल्म , एक भाषा , एक अभिनेता ,एक नया राज्य ,एक और स्मारक और पार्क, या ये देश जो इन सबके वजूद का स्रोत है! निश्चय ही आज सभी की भूमिकाएं तय होनी चाहिए !

         किसी  फिल्म का  प्रस्तुतीकरण होना चाहिए, लेकिन क्या इसके लिए देश की सुरक्षा से समझौता ? बिलकुल नहीं ! गृह मंत्री का ये बयान कि खुफिया एजेंसियां फेल नहीं हुयी है, इसी बात की ओर इशारा करती है कि कमी राज्य सरकार के तंत्र में है!  कोई अभिनेता इतना महत्वपूर्ण कैसे हो सकता कि एक प्रमुख राजनितिक दल पूरे राज्य की ब्यवस्था तहस नहस करने को आतुर हो जाये ! भूमिका की जांच उनकी भी होनी चाहिए जो इस भयावह आतंकवाद और नक्सलवाद  को भुलाकर स्वयं की मूर्तियों की रखवाली के लिए विशेष टास्क फोर्स गठित करने में संलग्न  हैं !

        यहाँ बात उनकी भी होनी चाहिए जो एक भाषा और तथाकथित भूमिपुत्रों के नाम पर संविधान की धज्जियाँ उधेड़ने में ही अपनी सार्थकता की व्यर्थ तलाश कर रहे हैं ! आज इन सभी संकीर्ण हितों से बढ़कर देशहित को महत्व देना समीचीन है क्यूंकि हमें नहीं भूलना चाहिए की हमारी नागरिकता एक है और वो है भारतीय होना ! सभी को मिलकर राष्ट्र भावना से भरकर और अपने तुच्छ स्वार्थों को भुलाकर एक ही उद्देश्य के लिए काम करने की आवश्यकता है जो है भारत की रक्षा ! अन्य सारी बातें इसी से तय होती है !!