Wednesday, May 4, 2011

धोखा....

दीवानों की महफ़िल में ,
देखो हम भी आ ही गए !
 ग़म भी हुआ हम हंसना भूले ,
आखिर धोखा खा ही गए !!

प्रथम दिवस के प्रथम मिलन की ,
याद हमें जब आती है !
रोम रोम में लहर ख़ुशी की ,
 मस्ती मन में छाती है !!

साथ जियेंगे, साथ मरेंगे , 
जीते जी हम जुदा  न होंगे !
दुश्मन हो चाहे सारा ज़माना , 
शीश प्रेम का झुकने न देंगे !!

सारी कसमें हमने खायीं ,
पर वो सितम  तो ढा ही गए !
ग़म भी हुआ हम हंसना भूले ,
आखिर धोखा खा ही गए !!

मधुर मुलाकातों के मौके ,
माघ महीने में मिलते थे !
उनकी सहज सुहानी सूरत ,
 पर बरबस ही हम मरते थे !!

सारे समय साथ उनका था ,
दोस्त यार की याद किसे थी !
जेब, जवानी जान उसे दी ,
फिक्र हमारी नहीं जिसे थी !!

हमने ह्रदय से जिसको चाहा ,
वे तो हमें भरमा ही गए !
ग़म भी हुआ, हम हंसना  भूले ,
आखिर धोखा खा ही गए !!

वे जब थे तो गम ही क्या था ?
बिन बोले ही हाल बयां था !
दिल दरिया था, सांसे सरगम ,
उनका हर एहसास जवां था !!

(अब जब वे नहीं हैं तब का हाल देखिये...... )

ताप धूप की तपिश बढ़ाती , 
प्रेम पवन भी रास न आती !
मद्धम-मद्धम बारिश की बूंदे ,
मन को मेरे नहीं लुभाती !!

समय चक्र ने करवट बदली ,
उड़ने की सजा हम पा ही गए ! 
ग़म भी हुआ हम हंसना भूले ,
आखिर धोखा खा ही गए !!

दीवानों की महफिल में , 
देखो हम भी आ ही गए !
ग़म भी हुआ हम हंसना भूले ,
आखिर धोखा खा ही गए !!

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