Friday, April 29, 2011

अब मैं बोलूँगा...

बस...बस !! अब मैं बोलूँगा  
नहीं रोकूंगा खुद को 
डरूँगा नहीं , लडूंगा !
अब अपनी बंद आँखें खोलूँगा ! 

हर्ज नहीं ग़र मारा जाऊंगा  
चुप रहकर , रोज-रोज-
मरने से तो बेहतर है ! 
किसी को मरते देख ,
किसी को मारते देख ,
आत्मचित्त , स्वार्थपूरित नेत्र 
अब मैं खोलूँगा , अब मैं बोलूँगा !

अपराध करना जुर्म है ,
तो जुर्म है उसे होने देना भी !
सिर्फ लच्छेदार भाषण ,
लम्बी लम्बी डींगे ...
नहीं नहीं... अब सहूंगा नहीं ,
न ही सहने दूंगा !

पकड़ लूँगा हाथ 
ग़र उठेगा किसी औरत पर ! 
छुड़ाउंगा मासूम बच्चों को 
जो शोषित हैं ,
शमित हैं , नहीं नहीं... 
वे बालश्रम से दमित हैं !
लूटने नहीं दूंगा 
अश्मिता अब किसी और की !
घटने नहीं दूंगा 
मान अपने बुजुर्गों का ! 
फूटने नहीं दूंगा 
भाग्य अपने भारत का !



तैनात रहूँगा 
हर समय , हर जगह !
अपनों को जोडूंगा 
बढ़ाऊंगा अपनी शक्ति !
लेकिन तमाशबीन , लाचार... 
..चाय की चुस्की और 
झूठी आह के साथ 
सबकुछ भूलकर 
स्वार्थ में पुनः 
डूब जाने की आदत !
अब मैं छोडूँगा !


करूँगा..लडूंगा..मरूँगा 
 पर चुप नहीं बैठूँगा !

अपने अधिकारों में 
कर्तब्यों को भी जोडूंगा !
 अब मैं बोलूँगा
आत्माचित्त , स्वार्थपूरित नेत्र 
अब मैं खोलूँगा !!

(फोटो : साभार गूगल इमेज )

5 comments:

Sunil Kumar said...

आज समय की ज़रूरत भी यही है | जरुरी सन्देश, आभार

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!!

Shah Nawaz said...

बहुत ही बेहतरीन और जोश भर देने वाली रचना है... वाकई अब बोलने का नहीं करने का समय आ गया है... अब नहीं जगे तो शायद जागने का समय भी ना मिले...

SHIVAM MISHRA said...

हौसला अफ़जाई के लिए आप सभी का बहुत धन्यवाद् !!

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

AAJKE SAMAY MEN BOLNA ZARURI HAI BHAI.
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