Saturday, April 30, 2011

हैं सभी अपने ...

सहनशील , सृजनशील...
..संघर्षशील नारी की ,
 दुःख भरी दास्ताँ !
हो कोई भी रूप ,
सिर्फ धूप ही धूप !
हैं सभी अपने ....
पर नहीं किसी को वास्ता !
नारी की दुःख भरी दास्ताँ !!

कभी परिवार के लिए, 
कभी समाज के लिए !
कभी कल के लिए... 
..तो कभी आज के लिए ! 
करती आयी है त्याग ,
सहती आयी है आग !
चलती है , रुकती है ,
बदल देती है रास्ता !
हैं सभी अपने .... 
पर नहीं किसी को वास्ता !
नारी की दुःख भरी दास्ताँ !!

कभी पिता की आन के लिए ,
कभी पति की शान के लिए !
कभी बेटे की जान के लिए ...
..तो कभी बेटी के मान के लिए !
देती आयी है बलिदान ,
सहती आयी है अपमान !
रोती है , घुटती है ,
समय भी, उसे है फांसता !
हैं सभी अपने ....
पर नहीं किसी को वास्ता !
नारी की दुःख भरी दास्ताँ !!

3 comments:

Sunil Kumar said...

बहुत संवेदनशील रचना , अच्छा सन्देश दे रही है, बधाई .....

shashi said...

excellent!!

Ruchi said...

Heart touching thought. Wonderful Work !