Sunday, May 8, 2011

ज़ालिम ये जिंदगी ...

ज़ालिम ये जिंदगी , ग़मों का सैलाब लाती है !
ज़ालिम ये जिंदगी , ग़मों का सैलाब लाती है !
रुलाती है ज्यादा , और थोड़ा हंसाती है !
कहते हैं सभी , कि खुश रहो यारों ,
पर कौन बताये हमें , ये खुशी कहाँ से आती है ?

बड़ी उम्मीद से , कदम हम जहाँ में रखते हैं !
बड़ी उम्मीद से , कदम हम जहाँ में रखते हैं !
आखिर में, इन्हीं उम्मीदों के , बोझ तले दबते हैं !
कहते हैं , सपने बड़े देखा करो ,
कम्बख्त सपने , क्या पेट भरा करते हैं ?

ख़ुदा अपने बन्दों का इम्तिहान लेता है !
ख़ुदा अपने बन्दों का इम्तिहान लेता है ! 
छोटी सी जिंदगी भी , टुकड़ों में देता है !
कहते हैं , ख़ुदा का रहमों करम है सब ,
ग़मों से जूझने की ताकत भी , खुदा ही तो देता है !

हमारी ख्वाहिशें गर , खुद में सिमट जाएँ , तो क्या करें ?
हमारी ख्वाहिशें गर , खुद में सिमट जाएँ तो , क्या करें ?
सभी को भूल कर , सब खुद पे लुटाएं , तो क्या करें ?
बहुत कुछ रख के भी , ख़ाली ही जायेगा ,ऐ मेरे दोस्त !
जो इंसान से हैवान बनाये , ऐसी दौलत का क्या करें ?

6 comments:

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जीवन की जद्दोज़हद को उकेरती सुंदर रचना .......

निर्मला कपिला said...

अगर आखिरी दो पँक्तिओं पर आदमी सोच समझ कर जीये तो शायद ज़िन्दगी ज़ालिम न हो मुझे तो लगता है आदमी ही ज़ालिम है जो जिन्दगी को अपने स्वार्थ के लिये तडपाता है। अच्छी रचना के लिये आभार।

वन्दना said...

आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
कल (9-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

http://charchamanch.blogspot.com/

शिखा कौशिक said...

हमारी ख्वाहिशें गर , खुद में सिमट जाएँ , तो क्या करें ?
हमारी ख्वाहिशें गर , खुद में सिमट जाएँ तो , क्या करें ?
सभी को भूल कर , सब खुद पे लुटाएं , तो क्या करें ?
बहुत कुछ रख के भी , ख़ाली ही जायेगा ,ऐ मेरे दोस्त !
जो इंसान से हैवान बनाये , ऐसी दौलत का क्या करें
Shivam ji bahut khoob likha hai aapne .badhai .

Vivek Jain said...

बहुत ही बढ़िया प्रस्तुति. बधाई।
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

Richa P Madhwani said...

sapne - khwaish k bare mai padker achha laga