Monday, May 16, 2011

यकीं है ख़ुद को कि ...

बहुत सोचा , बहुत समझा ,
मैं लेकिन सह नहीं पाया !
बिना देखे उसे , इक दिन ,
मगर मैं रह नहीं पाया !!

दिखाए ख्वाब उसने ,
जश्ने - ज़न्नत के , मुझे लेकिन !
हक़ीकत मैं उन्हें फिर भी ,
 कभी भी कर नहीं पाया !!

पहेली बनके रह गयी है ,
 देखो... ज़िन्दगी मेरी !
कि क़िस्मत ने दगा इक बार ,
 फिर मुझसे है फरमाया !!

वे कहते हैं मुसीबत , यूँ ही ,
 टल जाएगी.. ऐ मेरे दोस्त !
मुझे भी है यकीं , क्यूंकि ,
साथ मेरे , मेरे अपनों का है साया !!

ज़माने से नहीं सिकवा ,
शिकायत है न गैरों से !
ख़ुद ही को कोसता हूँ ,
दिल की मैं अपने , सुन नहीं पाया !!

अभी भी इल्म है मुझको ,
 कि मंजिल है मेरी मुमकिन !
दुखों के बादलों संग मैं ,
 अभी भी बह नहीं पाया !!

यकीं है ख़ुद को कि ,
इकदिन सितारा मेरा चमकेगा !
शख्सियत की बुलंदी का ख़जाना ,
मेरे फिर , काम है आया !!

6 comments:

वन्दना said...

बेहद उम्दा भावाव्यक्ति।

Sunil Kumar said...

रचना अच्छी लगी बधाई हो....

pushker said...

good,,,,,mere apne dil ka fasana mujhe mil gaya ,,,,akhir dukh kuchh to kam hua,,,,

दिगम्बर नासवा said...

मंज़िल ज़रूर मिलेगी ... हिम्मत रखनी हूगी ....

S.N SHUKLA said...

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , आभार

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

Gunjan Kumar said...

Heart touching sir,,,,,,,,

Thank you very much.