Tuesday, November 1, 2011

मन की कालिख.....


आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!


आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!


सुबह-शाम  प्रभु नाम की माला,
मस्तक तिलक लगाना यूँ....
मात-पिता की सुध बिसरा के,
उनको यूँ ठुकराना क्यूँ ??

खुद की खातिर खूब जतन की,
खरा खजाना भर बैठे !
मंदिर-मस्जिद प्रतिदिन पहुंचे,
क्यूँ ना अपने घर बैठे ??

आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!

जनम-मरण के जाल में फंसकर,
जब तू जग में आता है !
सच-सच बोल! अरे ये प्राणी,
क्या कुछ "कर" में लाता है ??

निडर हो कहते, निर्भय रहते,
मौत से फिर क्यूँ डर बैठे ?
स्नेह को भूले, दंभ में फूले,
जीते जी क्यूँ मर बैठे ??


आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!

आज अकेले दिया जलाकर,
घर में उजाला कर बैठे !
मन की कालिख साफ़ नहीं की,
तन उजियारा कर बैठे !!