Tuesday, December 20, 2011

हक़ीकत है नहीं, कुछ भी...

जीवित होना मात्र,

लक्ष्य नहीं मेरा...
कुछ भले जज़बात,
भी तो चाहिए...

हजारों बंदिशों में,
जी रहा हूँ मैं अभी...
मर जाने के हालात,
यूँ न लाईये...

ज़माना है,
मेरा दुश्मन...
कि दुश्मन मैं,
जमाने का...

कोई बतला दे,
मुझको अंत...
इस अनचाहे,
फ़साने का...

कोशिश है मेरी,
अपना लें...
मुझको सब,
मेरे अपने...

हक़ीकत है नहीं,
कुछ भी...
पराये हो गए,
.......सपने !!!

3 comments:

Sunil Kumar said...

हकीक़त ही सही है खुबसूरत अहसास मुबारक हो

S.N SHUKLA said...

ब्लॉग पर आगमन और समर्थन प्रदान करने का आभार, धन्यवाद.

बहुत सुन्दर रचना, सुन्दर भावाभिव्यक्ति , बधाई.

Pratibha Verma said...

हुत सुन्दर रचना...